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सवाल…

डरो नहीं , हटो नहीं सिर्फ़ सच के लिये जूझते रहो…
जब तक ज़िन्दा हो मेरे दोस्त…सवाल पूछते रहो

वो आवाज़ जो सिंहासनों को कभी अच्छी नहीं लगती
दरबारों की दिवारों पे उसी आवाज़ की तूती बन गूँजते रहो

जब तक ज़िन्दा हो मेरे दोस्त….

देखना नये रास्ते इन्हीं की कोख से जन्मेंगे
बस मिलें राह में जो वो पहेलियॉं बूझते रहो

जब तक ज़िन्दा हो मेरे दोस्त….

इनकी आदत है हमेशा ग़लत महफिलों में जाने की
ज़िन्दगी की इन आसानियों को इसकी मुशकिलों में ढूँढते रहो

जब तक ज़िन्दा हो मेरे दोस्त….

इस राख के नीचे देखो अब भी कुछ चिंगारी ज़िन्दा है
इसे दावानल बनाने को इसमें हुँकार फूँकते रहो ..

जब तक ज़िन्दा हो मेरे दोस्त….

निकलेगा तो इसकी ख़ातिर खड़े हुये हैं गले बहुत से हाथ बहुत
अमृत को मथना चाहो तो पहले हलाहल कूटते रहो
जब तक ज़िन्दा हो मेरे दोस्त….

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